Wednesday, July 6, 2016

Dabi Urja

दबी ऊर्जा

बाल अवस्था में जब पेड़ से पत्ता गिरता
तो मन में एक ख्याल गुदगुदाता:
पेड़ पे पत्ता चढ़ा कैसे?
फिर जब छुपा भेद जाना
तो हैरानी तो हुई पर जिगन्यासा दब गयी

जवानी में लड़के घुरके देखते
सीटियां बजाते, चक्कर काटते:
नसों में खून उगलता
फिर जाना के इंडियामें यह
बदलनेवाली रिवायत है;
ज्वालामुखी की आग दब गयी

पहले जब दिल टूटता था
तो ज़ोर से कांच के टूटने की आवाज़ आती:
टूटे टुकड़े समेटने में ज़माना निकल जाता
और आज जब दिल टूटता है तो
दबें पावों की आहट भी नहीं सुनाई देती;
मेरी अंदर की ज़िन्दगी दब गयी

आज जब पापा ने मम्मी को कसकर
थप्पड़ मारा तो वो रोने लगी:
मै अपनी लाचारी को कोस रही थी
जब मुझमे साहस  की एक लहर उठी
मैंने पापा का उठता हाथ रोक दिया;
बर्दाश्त करने की ख्वाहिश दब गयी


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